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30 अक्तूबर, 2013

"बिल्ली मौसी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बाल कविता
"बिल्ली मौसी"

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बिल्ली मौसी बिल्ली मौसी, 
क्यों इतना गुस्सा खाती हो। 
कान खड़ेकर बिना वजह ही,  
रूप भयानक दिखलाती हो।। 

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मैं गणेश जी का वाहन हूँ, 
मैं दुनिया में भाग्यवान हूँ।।  
चाल समझता हूँ सब तेरी, 
गुणी, चतुर और ज्ञानवान हूँ। 

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छल और कपट भरा है मन में, 
धोखा क्यों जग को देती हो? 
मैं नही झाँसे में आऊँगा, 
आँख मूँद कर क्यों बैठी हो?

26 अक्तूबर, 2013

"काली गइया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बाल कविता
"काली गइया"
black cow_1 सुन्दर-सुन्दर गाय हमारी।
काली गइया कितनी प्यारी।।

जब इसको आवाज लगाओ।
काली कह कर इसे बुलाओ।।।

तब यह झटपट आ जाती है।
अम्मा कह कर रम्भाती है।। 

23022009290 यह इसका है छोटा बछड़ा।
अक्सर करता रहता झगड़ा।।

जब यह भूखा हो जाता है।
जोर-जोर से चिल्लाता है।।

रस्सी खोल इसे हम लाते।
काली का दुद्धू पिलवाते।।

मम्मी बर्तन लेकर आती।
थोड़ा दूध दूह कर लाती।।

गाय हमारी गौमाता है।
दूध-दही की यह दाता है।।

22 अक्तूबर, 2013

"पतंग का खेल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बाल कविता
"पतंग का खेल" 
लाल और काले रंग वाली,
मेरी पतंग बड़ी मतवाली।

मैं जब विद्यालय से आता,
खाना खा झट छत पर जाता।
 
पतंग उड़ाना मुझको भाता,
बड़े चाव से पेंच लड़ाता।

पापा-मम्मी मुझे रोकते,
बात-बात पर मुझे टोकते।

लेकिन मैं था नहीं मानता,
नभ में अपनी पतंग तानता।

वही हुआ मन में जो डर था,
अब मैं काँप रहा थर-थर था।

मैं था यारों ऐसा हीरो,
सब विषयों लाया जीरो।

अब ये मैंने सोच लिया है,
पतंग उड़ाना छोड़ दिया है।

कभी नहीं अब हूँगा फेल,
नहीं करूँगा ज्यादा खेल।

आसमान में उड़ने वाली,
जो करती थी सैर निराली।

नहीं पतंग को प्यार करूँगा,
पढ़ने में अब ध्यान धरूँगा।

मित्रों! मेरी बात मान लो,
अपने मन में आज ठान लो।

पुस्तक लेकर ज्ञान बढ़ाओ।
कभी-कभी ही पतंग उड़ाओ।।

18 अक्तूबर, 2013

"एक मदारी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बाल कविता
"एक मदारी"


देखो एक मदारी आया।
 अपने संग लाठी भी लाया।।

डम-डम डमरू बजा रहा है।
भालू, बन्दर नचा रहा है।।

म्बे काले बालों वाला।
भालू का अन्दाज निराला।।

खेल अनोखे दिखलाता है।
बच्चों के मन को भाता है।।
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वानर है कितना शैतान।
पकड़ रहा भालू के कान।।

यह अपनी धुन में ऐँठा है।
भालू के ऊपर बैठा है।।

लिए कटोरा पेट दिखाता।
माँग-माँग कर पैसे लाता।।

14 अक्तूबर, 2013

"गांधी टोपी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बाल कविता
"गांधी टोपी"


गंजापन ढकने मेरीको टोपी, 

मेरे सिर पर रहती है।
ठिठुरन से रक्षा करती हूँ , 

बार-बार यह कहती है।। 
  
देखो अपनी गाँधी टोपी, 
सारे जग से न्यारी है।
आन-बान भारत की है ये, 

हमको लगती प्यारी है।।


लालबहादुर और जवाहर जी ने, 
इसको धार लिया।
भारत का सिंहासन इनको, 

टोपी ने उपहार दिया।।


टोपी पहिन सुभाषचन्द्र,
लाखों में पहचाना जाता।
टोपी वाले नेता का कद, 

ऊँचा है माना जाता।। 


खादी की टोपी, धोती, कुर्ते, 
की शान निराली है।  
बिना पढ़े ही ये पण्डित, 
का मान दिलाने वाली है।।  

टोपी पहन सलामी, 

अपने झण्डे को हम देते हैं। 
राष्ट्र हेतु मर-मिटने का प्रण, 
हम खुश होकर लेते है।।

11 अक्तूबर, 2013

"बालक की इच्छा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति 
नन्हें सुमन से
एक बालकविता
"बालक की इच्छा"
मैं अपनी मम्मी-पापा के,
नयनों का हूँ नन्हा-तारा। 
मुझको लाकर देते हैं वो,
रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।
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मुझे कार में बैठाकर,
वो रोज घुमाने जाते हैं।
पापा जी मेरी खातिर,
कुछ नये खिलौने लाते हैं।।

मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,
वो फूले नही समाते हैं।
जग के स्वप्न सलोने,
उनकी आँखों में छा जाते हैं।।

ममता की मूरत मम्मी-जी,
पापा-जी प्यारे-प्यारे।
मेरे दादा-दादी जी भी,
हैं सारे जग से न्यारे।।

सपनों में सबके ही,
सुख-संसार समाया रहता है।
हँसने-मुस्काने वाला,
परिवार समाया रहता है।।

मुझको पाकर सबने पाली हैं,
नूतन अभिलाषाएँ।
क्या मैं पूरा कर कर पाऊँगा,
उनकी सारी आशाएँ।।

मुझको दो वरदान प्रभू!
मैं सबका ऊँचा नाम करूँ।
मानवता के लिए जगत में,
अच्छे-अच्छे काम करूँ।।  

07 अक्तूबर, 2013

"आयी रेल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 एक बालकविता
"आयी रेल"

धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।

इंजन चलता सबसे आगे।
पीछे -पीछे डिब्बे भागे।।
हार्न बजाता, धुआँ छोड़ता।
पटरी पर यह तेज दौड़ता।।

जब स्टेशन आ जाता है।
सिग्नल पर यह रुक जाता है।।
जब तक बत्ती लाल रहेगी।
इसकी जीरो चाल रहेगी।।
हरा रंग जब हो जाता है।
तब आगे को बढ़ जाता है।।

बच्चों को यह बहुत सुहाती।
नानी के घर तक ले जाती।।
छुक-छुक करती आती रेल।
आओ मिल कर खेलें खेल।।
धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।

03 अक्तूबर, 2013

"कौआ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 एक बालकविता
"कौआ"

कौआ बहुत सयाना होता।
कर्कश इसका गाना होता।।

पेड़ों की डाली पर रहता।
सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।

कीड़े और मकोड़े खाता।
सूखी रोटी भी खा जाता।।

सड़े मांस पर यह ललचाता।
काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।

साफ सफाई करता बेहतर।
काला-कौआ होता मेहतर।।