यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

28 मार्च, 2012

"फूले नहीं समाये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मुक्त परीक्षा से होकर,
हम अपने घर में आये।
हमें देखकर दादा-दादी, 
फूले नहीं समाये।।

लगा हुआ था काशीपुर में,
बाल सुन्दरी माँ का मेला।
बाबा-दादी ने दिखलाया.
वहाँ हमें सरकस का खेला।
जोकर की बातें सुनकर,
हम बहुत हँसे-मुस्काये।
हमें देखकर दादा-दादी, 
फूले नहीं समाये।।


पहले गये खोखरे पर हम,
फिर आये माँ के दरबार।
अपना शीश नवाया हमने,
माँ की महिमा अपरम्पार।
भूख लगी तो बाबा जी ने,
चाट-पकौड़े खिलवाये।
हमें देखकर दादा-दादी, 
फूले नहीं समाये।।

देहरादून हमारे पापा,
सरकारी सेवा करते हैं।
इसीलिए हम भी तो,
उनके साथ-साथ रहते हैं।
बहुत दिनों के बाद,
खटीमा के दर्शन कर पाये।
हमें देखकर दादा-दादी, 
फूले नहीं समाये।।