"हम प्रसून हैं अपने मन के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
>> 10 February, 2012
हम प्रसून हैं अपने मन के गन्घ भरे हम सुमन चमन के। हम प्रसून हैं अपने मन के।। आँगन में खिलते-मुस्काते, देशभक्ति की अलख जगाते, हम हैं कर्णधार उपवन के। हम प्रसून हैं अपने मन के।। जो दुनिया में सबसे न्यारी, जन्मभूमि वो हमको प्यारी, उगते रवि हम नीलगगन के। हम प्रसून हैं अपने मन के।। ऊँचे पर्वत और समन्दर, रत्न भरे हैं जिनके अन्दर, पाठ पढ़ाते जो जीवन के। हम प्रसून हैं अपने मन के।। हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई हैं, आपस में भाई-भाई हैं, इक माला के हम हैं मनके। हम प्रसून हैं अपने मन के।। |






15 comments:
बढ़िया है सर
khoob....hona hi chahiye aapna prashoon.....apne maan ka....
बहुत बढ़िया लयबद्ध कविता|
बहुत सुंदर....
बहुत बढ़िया....
बहुत बढ़िया....
सुंदर , मर्मस्पर्शी रचना
बच्चे मन के राजा ही होते हैं .. सुन्दर कविता
सुंदर।
बहुत सुन्दर बाल कविता।
बहुत सुन्दर बालरचना!
बढ़िया देशभक्ति रचना
हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई हैं,आपस में भाई-भाई हैं,इक माला के हम हैं मनके।हम प्रसून हैं अपने मन के।।
...बहुत सुन्दर बाल-गीत..बधाई.
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'पाखी की दुनिया' में जरुर मिलिएगा 'अपूर्वा' से..
आँगन में खिलते-मुस्काते,
देशभक्ति की अलख जगाते,
हम हैं कर्णधार उपवन के।
हम प्रसून हैं अपने मन के।।
आदरणीय शास्त्री जी ..सुन्दर सन्देश देती रचना ...बच्चों को अलख जगाने का मन्त्र ..खूबसूरत ...
जय श्री राधे
भ्रमर 5
बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....
इंडिया दर्पण की ओर से नव संवत्सर व नवरात्रि की शुभकामनाए।
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