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27 फ़रवरी, 2010

"कम्प्यूटर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


 
यह मेरा कम्प्यूटर प्यारा,
इसमें ज्ञान भरा है सारा।

भइया इससे नेट चलाते,
नई-नई बातें बतलाते।
यह प्रश्नों का उत्तर देता,
पल भर में गणना कर लेता।


माउस, सी.पी.यू, मानीटर,
मिलकर बन जाता कम्प्यूटर।
इसमें ही की-बोर्ड लगाते,
जिससे भाषा को लिख पाते।

नया जमाना अब है आया,
हमने नया खजाना पाया।
बड़ा अनोखा है यह ट्यूटर,
सभी सीख लो अब कम्प्यूटर।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

25 फ़रवरी, 2010

“आई होली! आई होली!!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आयी होली, आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।

मुन्नी आओ, चुन्नी आओ,
रंग भरी पिचकारी लाओ,

मिल-जुल कर खेलेंगे होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

मठरी खाओ, गुँजिया खाओ,
पीला-लाल गुलाल उड़ाओ,

मस्ती लेकर आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

रंगों की बौछार कहीं है,

ठण्डे जल की धार कहीं है,
भीग रही टोली की टोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

परसों विद्यालय जाना है,

होम-वर्क भी जँचवाना है,
मेहनत से पढ़ना हमजोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

24 फ़रवरी, 2010

“संगीता स्वरूप का बालगीतः रेल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

छुक-छुक करती आई रेल!


छुक-छुक करती आई रेल!
आओ मिलकर खेलें खेल!!

लालू-ममता जल्दी आओ!
आकर के डिब्बा बन जाओ!!
खूब चलेगी अपनी रेल!
आओ मिलकर खेलें खेल!!

गुड्डी आई पिंकी आई!
लाल हरी झण्डी ले आई!!
लगी रेंगने अपनी रेल!
आओ मिलकर खेलें खेल!!

इंजन चलता आगे-आगे!
पीछे-पीछे डिब्बे भागे!!
स्टेशन पर रुकती रेल!
आओ मिलकर खेलें खेल!!

टिकट कटाओ करो सवारी!
बिना टिकट जुर्माना भारी!!
जाना पड़ सकता है जेल!
आओ मिलकर खेलें खेल!!
sangitaswaroop
(श्रीमती संगीता स्वरूप)

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

23 फ़रवरी, 2010

‘‘मोबाइल फोन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

mobile
पापा ने दिलवाया मुझको,
सेल-फोन इक प्यारा सा।
मन-भावन रंगों वाला,
यह एक खिलौना न्यारा सा।।


रोज सुबह को मुझे जगाता,
मोबाइल कहलाता है।
दूर-दूर तक बात कराता,
सही समय बतलाता है।।


नम्बर डायल करो किसी का,
पता-ठिकाना बतलाओ।
मुट्ठी में इसको पकड़ो और,
संग कहीं भी ले जाओ।।


इससे नेट चलाओ चाहे,
बात करो दुनिया भर में।
यह सबके मन को भाता है,
लोकलुभावन घर-घर में।।


बटन दबाते ही मोबाइल,
काम टार्च का देता है।
पलक झपकते ही यह सारा,
अंधियारा हर लेता है।।


सेल-फोन इस युग का,
इक छोटा सा है कम्प्यूटर।
गुणा-भाग करने वाला,
बन जाता कैल-कुलेटर।।

22 फ़रवरी, 2010

‘‘मेरी गैया’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)



मेरी गैया बड़ी निराली,
 सीधी-सादी, भोली-भाली।

सुबह हुई काली रम्भाई,
मेरा दूध निकालो भाई।

हरी घास खाने को लाना,
उसमें भूसा नही मिलाना।

उसका बछड़ा बड़ा सलोना,
वह प्यारा सा एक खिलौना।

मैं जब गाय दूहने जाता,
वह अम्मा कहकर चिल्लाता।

सारा दूध नही दुह लेना,
मुझको भी कुछ पीने देना।

थोड़ा ही ले जाना भैया,
सीधी-सादी मेरी मैया।

(चित्र गूगल से साभार)

21 फ़रवरी, 2010

‘‘तितली रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)


मन को बहुत लुभाने वाली,
तितली रानी कितनी सुन्दर।
भरा हुआ इसके पंखों में,
रंगों का है एक समन्दर।।

उपवन में मंडराती रहती,
फूलों का रस पी जाती है।
अपना मोहक रूप दिखाने,
यह मेरे घर भी आती है।।

भोली-भाली और सलोनी,
यह जब लगती है सुस्ताने।
इसे देख कर एक छिपकली,
आ जाती है इसको खाने।।

आहट पाते ही यह उड़ कर,
बैठ गयी चौखट के ऊपर।
मेरा मन भी ललचाया है,
मैं भी देखूँ इसको छूकर।।

इसके रंग-बिरंगे कपड़े,
होली की हैं याद दिलाते।
सजी धजी दुल्हन को पाकर,
बच्चे फूले नही समाते।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

19 फ़रवरी, 2010

“भगवान एक है!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारे।
भक्तों को लगते हैं प्यारे।। 
हिन्दू मन्दिर में हैं जाते।
देवताओं को शीश नवाते।।
ईसाई गिरजाघर जाते।
दीन-दलित को गले लगाते।। 
जहाँ इमाम नमाज पढ़ाता।
मस्जिद उसे पुकारा जाता।।
सिक्खों को प्यारे गुरूद्वारे।
मत्था वहाँ टिकाते सारे।।


राहें सबकी अलग-अलग हैं।
पर सबके अरमान नेक है।

नाम अलग हैं, पन्थ भिन्न हैं।
पर जग में भगवान एक है।।

(सभी चित्र गूगल से साभार)

18 फ़रवरी, 2010

“संगीता स्वरूप का बालगीत” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“चूहे की होली” 


 चूहा  खेल रहा था होली।
रंगो की लेकर रंगोली।।

भर पिचकारी उसने मारी।
बिल्ली  मौसी भीगी सारी।।

अब बिल्ली को गुस्सा आया।
उसने चूहे को धमकाया।।

चूहा थर-थर काँप रहा था। 
डरकर माफ़ी  मांग रहा था।।

हंस कर तब बिल्ली ये बोली।
होली है भई , है भई  होली।।

चूहा  ये सुनकर मुस्काया। 
उसने लाल गुलाल  उड़ाया।।

दोनों ने त्यौहार मनाया।
होली का हुडदंग  मचाया।।

sangitaswaroop
(संगीता स्वरूप)
 

“भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो!”(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो!”

भैया! मुझको भी,
लिखना-पढ़ना, सिखला दो।
क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी,
गिनती भी बतला दो।।


पढ़ लिख कर मैं,
मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।
दुनिया भर में,
बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।


रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे,
मैं भी उठा करूँगी।
पुस्तक लेकर पढ़ने में,
मैं संग में जुटा करूँगी।।


बस्ता लेकर विद्यालय में,
मुझको भी जाना है।
इण्टरवल में टिफन खोल कर,
खाना भी खाना है।।


छुट्टी में गुड़िया को,
ए.बी.सी.डी, सिखलाऊँगी।
उसके लिए पेंसिल और,
इक कापी भी लाऊँगी।।

17 फ़रवरी, 2010

“बाल-गीत” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

हाथी दादा सूंड उठा कर,

चले देखने मेला।


बन्दर मामा साथ हो लिया,

बन करके उनका चेला।


चाट पकौड़ी खूब उड़ाई,


देख चाट का ठेला।


बड़े मजे से फिर दोनों ने,


जम करके खाया केला।


अब दोनों आपस में बोले, 


अच्छा लगा बहुत मेला।


(चित्र गुगल सर्च से साभार)

16 फ़रवरी, 2010

‘‘चिड़िया रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बच्चों अर्थात्
नन्हीं कलियों और सुमनों को समर्पित हैः
यह
“नाइस” ब्लॉग!
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चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर,
मीठा राग सुनाती हो।
आनन-फानन में उड़ करके,
आसमान तक जाती हो।।

मेरे अगर पंख होते तो,
मैं भी नभ तक हो आता।
पेड़ो के ऊपर जा करके,
ताजे-मीठे फल खाता।।

जब मन करता मैं उड़ कर के,
नानी जी के घर जाता।
आसमान में कलाबाजियाँ कर के,
सबको दिखलाता।।

सूरज उगने से पहले तुम,
नित्य-प्रति उठ जाती हो।
चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से ,
मुझको रोज जगाती हो।।

तुम मुझको सन्देशा देती,
रोज सवेरे उठा करो।
अपनी पुस्तक को ले करके,
पढ़ने में नित जुटा करो।।


चिड़िया रानी बड़ी सयानी,
कितनी मेहनत करती हो।
एक-एक दाना बीन-बीन कर,
पेट हमेशा भरती हो।।

अपने कामों से मेहनत का,
पथ हमको दिखलाती हो।।
जीवन श्रम के लिए बना है,
सीख यही सिखलाती हो।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

09 फ़रवरी, 2010

“तार वीणा के बजे बिन साज सुन्दर।” (मयंक)

11
कह दिया मेरे सुमन ने आज सुन्दर।
तार वीणा के बजे बिन साज 
सुन्दर ।।

ज्ञान की गंगा बही, विज्ञान पुलकित हो गया,
आकाश झंकृत हो गया, संसार हर्षित हो गया,
नाम से माँ के हुआ आगाज़ 
सुन्दर 
तार वीणा के बजे बिन साज 
सुन्दर ।।

बेसुरे से राग में, अनुराग भरने को चला हूँ,
मैं बिना पतवार, सरिता पार करने को चला हूँ,
माँ कृपा करदो, बनें सब काज 
सुन्दर 
तार वीणा के बजे बिन साज 
सुन्दर ।।

वन्दना है आपसे, रसना में माँ रस-धार दो,
लेखनी चलती रहे, शब्दो को माँ आधार दो,
असुर भागें, हो सुरो का राज 
सुन्दर 
तार वीणा के बजे बिन साज 
सुन्दर ।।